Aesthetic overthinking
उन्होंने मेरा हाथ देखा और मैंने उनका चेहरा । मैं जानती थी वो क्या कहने वाले हैं— इतनी रेखाएँ किसी की हथेली पर नहीं देखीं— सब यही कहते हैं । जितनी अधिक रेखाएँ उतना ही अधिक सोचने वाला व्यतित्व !
एक तरह की थकान होती है जो नींद नहीं माँगती।
वह विराम माँगती है।
आज घर की आवाज़ें सामान्य हैं — ठीक से बंद न किया गया नल, गली से तेज़ गुज़रती कोई बाइक, पड़ोस की बालकनी से आती हँसी। दुनिया अपनी छोटी-छोटी व्यवस्थाओं में लगी हुई है। मैं उनके बीच खड़ी हूँ — कार्यशील, संयत, लगभग व्यवस्थित।
संदेशों का उत्तर देती हूँ। सूचियाँ बनाती हूँ। जो अपेक्षित है, पूरा करती हूँ।
पर इस दृश्यमान लय के नीचे एक और धारा बह रही है। यह ठीक-ठीक उदासी नहीं है, न ही निराशा। यह कुछ अधूरा-सा है — जैसे कोई वाक्य जो बार-बार अपने शब्द बदल रहा हो, पर पूर्णविराम तक नहीं पहुँच रहा।
मैंने हमेशा सोचा था कि स्पष्टता किसी उद्घोषणा की तरह आएगी — ठोस, निर्विवाद। पर वह ऐसे आती है: टुकड़ों में। “हाँ” कहने से पहले के ठहराव में। “न” कहने के बाद की चुप्पी में।
मेरे भीतर एक आकृति है — अनुशासित, निडर, पूर्ण। मैं उसका सम्मान करती हूँ। पर अब यह भी सीख रही हूँ कि उसकी ओर भागना ही एकमात्र रास्ता नहीं है
आज यह भारीपन मुझे डराता नहीं। यह मौसम-सा है। या तो बरसेगा, या यूँ ही गुज़र जाएगा।
दोनों ही स्थितियों में, मैं यहीं रहूँगी, अपने हाथों की लकीरों को देखती — अपने विचारों को शेल्फ पर सजी किताबों की तरह व्यवस्थित करती हुई, यह स्वीकारते हुए कि हर कहानी का निष्कर्ष होना ज़रूरी नहीं होता।
मगर मैं थक गई हूँ और यह थकान नींद नहीं माँगती
यह विराम माँगती है

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