हो गया पूर्ण अज्ञात वास ...
महाभारत की कथा के अनुसार पांडवों को 13 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञात वास मिला था। मेरे प्रिय कवि दिनकर इसी परिप्रेक्ष्य में लिखते हैं,
" हो गया पूर्ण अज्ञात वास
पांडव लौटे वन से सहास
पावक में कनक-सदृश तप कर,
वीरत्व लिए कुछ और प्रखर "
अपने जीवन की महाभारत में मैं अपने वनवास में हूँ। हालांकि उसके अज्ञात होने पर अभी संशय है, परन्तु उसके एकांत होने पर कोई संशय नहीं।
मैंने कहीं पढ़ा था कि जब तक आप को कोई न पुकारे और आप उसका उत्तर नहीं दें तब तक आपका अस्तित्व इस संसार में केवल मिथ्या है। मेरे विचार में यह मनुष्य, एक सामाजिक प्राणी, के जीवन का सार है।
अपने दफ़्तर की कुर्सी पर बैठ कर मेज़ पर रक्खे किसी प्रतिवेदन को देखना मेरे जीवन के अस्तित्व को आधार नहीं देता।
लकड़ी की उबड़ - खाबड़ बेंच पर पड़ा, मेरे वर्षों की मेहनत और ज्ञान का प्रतिफल, एक omr, जो कभी कभी मेरे जीवन से भी अधिक मूल्यवान लगता है- वह भी मेरे जीवन के अस्तित्व को आधार नहीं देता।
कमरे में निश्चिंतता से चलता AC , किशोर कुमार की आवाज़ में तैरता गाना, मेज़ पर पड़ी किताब, कुर्सी पर बैठा मेरा शरीर- इनमें से कुछ भी इस 3 कमरों, एक किचन, एक हॉल वाले सरकारी आवास के एक मात्र जीवंत कमरे को जीवंत नहीं बनाता।
मेरे अस्तित्व को आधार तब मिलता है जब मेज़ पर पड़े प्रतिवेदन से सिर उठा कर मैं उस कर्मी की तरफ देखती हूँ जो दरवाज़े पर खड़ा कह रहा है - " मैडम, कोर्ट का टाइम हो गया है "
अपने प्राण एक omr में झोंकने के बाद जब मैं अपने जीवन का मूल्यांकन करने लगती हूँ, और मेरी बहन पूछती है- " बताओ क्या खाओगी दीदी, कुछ बढ़िया order करते हैं" तब मेरा अस्तित्व मिथ्या नहीं रह जाता।
जब भौतिक रूप से अनुपस्थित हो कर भी कुछ लोग आंतरिक रूप से उपस्थित हो जाते हैं तब जीवन जीवंत हो जाता है।
3 कमरों, एक किचन, एक हॉल वाले सरकारी आवास का कमरा तब जीवंत होता है जब किशोर कुमार की आवाज़ को विराम देती हुई whatsapp की रिंग बजती है और सामने video call पर मेरी सबसे प्यारी दोस्त अपनी बातों का पिटारा लिए प्रकट हो जाती है।
जीवन खिल उठता है जब फोन की घंटी बजे और सामने मेरे पिता पूछ रहे हों -
" आज खाने में क्या खाया? "
" काम वाली आई थीं आज? "
" अरे कुछ बोलो, आवाज़ आ रही है? हेलो! हेलो? "
और मैं कहती हूँ - "हाँ पापा, आवाज़ आ रही है, खाने में क्या खाया अब याद नहीं, आप भी ये क्या पूछते रहते हैं! "
मेरे जीवन को अस्तित्व तब मिलता है जब कोई पुकारता है और मैं उत्तर देती हूँ।
पांडवों की तरह वनवास से मैं 'कनक- सदृश' तप कर निकलूंगी या नहीं इसमें कुछ संशय है। जीवन एकांत है, अज्ञात नहीं - इसमें कोई संशय नहीं।


कनक -सदृश तप कर जरूर निकलोगी, लेखनी तो जरूर कनक के समान निखर गई है।
ReplyDeleteनिरंतर लगन से किया गया कार्य कभी असफल नहीं होता! समय की अपनी योजनाएं है ।
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