नए सत्र की पुरानी कहानियाँ

 बड़े दिनों बाद आज कुछ लिखने बैठा हूँ। कुछ अपरिहार्य कारणों, जिसे सरल और सहज भाषा में लोग लैक औफ मोटिवेशन कहते हैं, की वजह से कई दिनों से कागज़ - कलम से ये आत्मिय संबंध स्थापित नहीं हो पा रहा था। वैसे तो आज बड़े सारे काम, कमरे के दरवाज़े के बाहर खड़े, अंदर झांक रहे हैं, और मुझे एक अपराध बोध से भर रहे हैं, मगर मनुष्य जीवन में कुछ बने या ना बने, किसी न किसी प्रकार का अपराधी तो बन ही जाता है। इसलिए दरवाजे की कड़ी लगा कर मैं लिखने बैठ गया हूँ।

मुझे ज्ञात है कि मेरे लिंग व्याकरण में त्रुटि है। मैं यह भी बताता चलूं कि ये मैं जानबूझ के कर रहा हूँ। पहली बात तो यह है कि जितनी शुद्ध हिंदी मैं लिख रहा हूँ, वैसी मैंने कभी बोली नहीं है। हिंदी के अनेको अवतारों में से जो तथागत हिंदी हमारे यहां बोली जाती है, उसमें लिंग भेद बड़ा लिब्रल है।

दूसरी बात, वैज्ञानिक कारणों पर आधारित मेरी यह मान्यता है कि स्त्रिलिंग की अपेक्षा, अगर मैं पुल्लिंग का उपयोग करूँ, तो मुझे गल्ती करने की ज़्यादा छूट मिलेगी। खैर, रह रह कर मुझे पर मेरी शिक्षा का बोझ और नारीवाद का भूत हावी होने लगता है, इसलिए आगे आपको यह त्रुटि नहीं मिलेगी। मैं अपनी ओर से शुद्ध एवं सरल लिखने का प्रयास करूँगी।

अप्रैल का महीना, गर्मी की दोपहरी, और छुट्टी का दिन। मेरे कमरे की लाइटें बंद हैं, और पर्दों से छन कर उतनी ही रोशनी आ रही है जितनी मेरी आखों को चुभे ना। कमरे का ए॰सी॰ पिछले एक घंटे से औन है, जिसे मैं कुछ देर में बंद कर दूँगी, जब मुझे ग्लोबल वार्मिंग की चिंता होने लगेगी। यहां मुझे बिजली बिल की चिंता नहीं होती- सरकारी नौकरी के अपने फायदे हैं।

मैंने अपने फोन पर तापमान चेक किया-31 degree Celsius. मैंने लगे हाथ अपने शहर का भी तापमान देख लिया- 37 degree Celsius. अपना शहर- बहुत दूर, बहुत गर्म, परन्तु अपना!


बचपन में हमारे घर पर एसी तो दूर, कूलर भी नहीं था, पर गर्मी उतनी ही थी. अप्रैल में स्कूल का नया सेशन शुरू होता था और साथ ही शुरू होती थी लू। तब हमारी मम्मी कमरों की खिड़कियों और दरवाजों पर मोटे कंबल टांग देती थीं। सुबह ही पानी भर कर टब में रख लेती थी और उसी पानी से हमें स्कूल से वापस आने के बाद नहला कर, डर्मी कूल लगा कर हमें सुलाने का भरसक प्रयास करती थी, जो कि यदा कदा ही सफल होता था.

मैं और मेरी बहन मम्मी के सो जाने के बाद सीढियों के नीचे खेला करते थे। हमने तब हैरी पॉर्टर नहीं देखी थी। हमारा पता नहीं पर हमारी मम्मी जादुगर थीं।


स्कूल की नई किताबें और किताबों पर नये कवर ने जितना आनन्द मुझे दिया है, उतना किसी नई ड्रेस को पहन कर नहीं आया। जब मैं छोटी थी, तो समझ नहीं पाती थी कि आखिर पापा जल्द से जल्द नई किताबें क्यों नहीं ला रहे? फिर कुछ बड़ी हुई, तो सैधान्तिक रूप से समझने लगी. और पिछले माह जब फरवरी का वेतन 28 दिन देर से मिला, तब प्रायोगिक रूप से भी समझ आ गया।

पापा भी सचमुच हमारे जादुगर ही रहें होंगे, जो हर साल मार्च के महीने में अपने पिटारे से नई किताबें, नई कौपियां, नई कवर, और नई स्टिकर निकाल लाते थे। पिछले महीने जब तनख़ाह लेट थी, तब उन्होंने अपने जादुगर पिटारे की ओर हाथ बढ़ाया, पर मैंने रोक दिया, अब नई किताबें जो नहीं लेनी।


आश्चर्य है कि ऐसे जादूगर माता पिता के मगलू बच्चे कैसे निकल आये? खैर, मम्मी छुट्टी के दिन घर पर छोले भटूरे बनाती थीं. वे अब भी मुझे कहती हैं कि क्यों नहीं कुक से कहकर बनवा लेती हो? पर मैं टाल देती हूँ. आज कुक दीदी ने खुद ही छोले बना दिये हैं. मम्मी को बताउंगी तो बहुत खुश होंगी.


अब मुझे ग्लोबल वार्मींग की चिंता होने लगी है। एसी बंद करने का वक्त हो चला है। बिजली बिल की चिंता मुझे नहीं होती- सरकारी नौकरी के अपने फायदे हैं।






Comments

  1. बहुत अच्छा चित्रण

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  2. बाल्यावस्था से युवास्था का दार्शनिक चित्रण अत्यंत मनोरम।

    सरकारी नौकरी के और बड़े फायदे जल्द देखने को मिले ईश्वर से प्रार्थना।

    शुभकामनाएं सहित 🙏

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