नारियल पानी
सामने पड़ी बोतल को शर्वरी बड़ी देर से देखे जा रही थी। अगर कोई उसे इस तरह से आधी खाली बोतल को देखता पाता, तो यही सोचता कि वह आशावाद-निराशावाद के किसी गूढ़ दर्शन में डूबी हुई है। मगर ना तो उसे कोई देखने वाला था और ना ही वह कहीं डूबी थी। उसे तो चिंता थी कि जब इस बोतल में बचा हुआ नारियल पानी खत्म हो जाएगा, तो वह क्या करेगी!
आपके और मेरे लिए यह बात बहुत मामूली या शायद हास्यास्पद भी हो सकती है। मगर शर्वरी के लिए यह एक भारी चिंता का विषय था। शर्वरी हर चीज़ प्लान करके चलती थी। घर में चावल खत्म होने के पहले ही वह चावल मंगा लेती थी। उसके पास हमेशा दो शैम्पू की bottles होती थीं, ताकि अगर एक अचानक खत्म हो जाए तो वह दूसरी इस्तेमाल कर सके और उसे कोई stress न हो।शायद अब तक आप शर्वरी को थोड़ा बहुत समझ गए होंगे और सोच रहे होंगे कि इसमें चिंता की क्या बात थी? शर्वरी को दूसरी और न हो तो तीसरी नारियल पानी की बोतल मंगा लेनी चाहिए। आप ये भी सोच रहे होंगे कि बोतल का नारियल पानी कौन पीता है? शर्वरी की चिंता की तरह इस बात का भी explanation आपको हास्यास्पद लग सकता है।
हाँ, तो बात ऐसी थी कि शर्वरी अपने घर से बहुत दूर एक छोटे से शहर में अपने काम के सिलसिले में रहती थी। वैसे तो बाजारीकरण के दौर में हर चीज़ हर जगह मिल जाती है, मगर शर्वरी का झुकाव पूंजीवाद की ओर ज़्यादा जान पड़ता है। अगर कोई चीज़ वह ऑनलाइन ऑर्डर कर सकती है, तो वह ऑनलाइन ही करेगी, चाहे वह नारियल पानी हो या यूं कहें कि सीबॉटल्ड कोकोनट वॉटर' ही क्यों न हो।
जब से उस पर हेल्दी डाइट का भूत सवार हुआ है, यानी कि विगत पांच दिनों से, वह नारियल पानी पी रही है। यह बोतल, जिसे हम कहानी की पहली लाइन से देख रहे हैं, उसकी हेल्दी डाइट श्रृंखला की आखिरी बोतल है। अब भी आप सोच रहे होंगे कि इसमें चिंता की आखिर क्या बात है?
बताती हूँ, पाठक को धैर्य रखना चाहिए। "धैर्य सर्वस्य साधनम्।"
देश के जिस छोर पर शर्वरी रहती है, वहाँ कोई भी ऑनलाइन ऑर्डर पहुँचने में कम से कम पांच दिन लगते हैं। यह तो दरअसल ऊपर की बात है। अंदर की बात तो यह है कि पूंजीवाद के असल मायने, शर्वरी को नारियल पानी की बोतल ऑर्डर करने के बाद, उसकी बैंक स्टेटमेंट ने बताए। इतने पैसे खर्च करना उसे अखर रहा था। और अचानक उसे प्लास्टिक की बोतल से पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भी चिंता होने लगी थी।
अगर कोई शर्वरी के दिमाग में चल रही बातों को सुन पाता, तो उसके मासूम से पाखंड पर ज़रूर मुस्कुराता और इस बात का गवाह भी बनता कि शर्वरी आखिरकार है तो एक मनुष्य ही। मगर उसे कोई सुनने वाला नहीं था।
जितनी देर में हमने ये सारी बातें की, उतने में और समय बीत गया। शर्वरी अब भी आधी खाली बोतल की दिशा में देख रही थी। अगर कोई शर्वरी को देख रहा होता, तो इतनी देर में उसे देखते-देखते बोर होकर दूसरे कमरे में चला जाता। मगर आपको तो पता ही है, उसे देखकर बोर होने वाला कोई नहीं था।
शून्य में देखते-देखते अचानक शर्वरी की आँखों में एक चमक आ गई। उसकी चिंता का एक सरल समाधान उसे मिल गया था। अगले दिन जब वह दफ्तर के लिए निकली, तो एक मकसद के साथ निकली।
शर्वरी उस छोटे से शहर के एक बड़े से दफ्तर के एक मीडियम साइज कमरे में एक मीडियम साइज कुर्सी पर बैठती थी।कुर्सी में चक्के लगे थे और एक सफेद तौलिया बिछा था।सरकारी दफ्तरों की प्रथा के मुताबिक, सफेद तौलिया बिछी, चक्के वाली कुर्सियों के लिए एक राशि निर्धारित रहती है, जो सरकारी वेतन के अलावा उस कुर्सी पर विराजमान, गणमान्य, विश्वासभाजन को प्राप्त होती है। आप लोग इस व्यवस्था को जो नाम उचित लगे, वो दें। मैं इसे प्रथा ही कहूंगी।
सफेद चक्के वाली कुर्सी पर बैठने के शुरुआती दिनों में शर्वरी इस प्रथा से अंजान रही। कुर्सी पर विराजमान होकर वह गणमान्य तो बन गई थी, मगर विश्वासभाजन बनने में थोड़ा समय लगता है। कुछ दिनों बाद दफ्तर के एक कर्मचारी ने उसे इस प्रथा के बारे में बताया था। 10th तक moral science और ग्रेजुएशन के बाद ethics पढ़ी शर्वरी ने इस प्रथा को मानने से इंकार कर दिया था। पूरी तरह खंडन करने की क्षमता तो उसमें नहीं थी, तो उसने खुद को इस प्रथा का हिस्सा न बना कर ही अपने चरित्र को बाकियों से ऊँचा मान लिया।
ख़ैर, दफ्तर की प्रथा पर शर्वरी के ऊँचे चरित्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। निर्धारित राशि कुर्सी की थी, शर्वरी की नहीं। उसने कर्मचारी से पूछा कि उससे पहले जो विश्वासभाजन कुर्सी पर विराजमान थे, क्या उन्हें भी ये राशि प्राप्त होती थी? कर्मचारी ने बताया कि वे राशि तो हाथ नहीं लगाते थे, हाँ, उनके घर का दूध, पनीर, सब्जी आदि दफ्तर के कर्मियों के ही जिम्मे था।शर्वरी ने राशि और दूध-पनीर दोनों को ही मना कर दिया। ऐसा करके उसे लगा कि उसका कद बाकियों से कुछ इंच ऊँचा हो गया है। वह साथ ही यह भी चाहती थी कि लोग उसके ऊँचे चरित्र और ऊँचे कद को देखें। वह बताना चाहती थी कि दफ्तर की इस प्रथा में उसने खुद को शामिल नहीं किया है।
ऊँचे चरित्र और ऊँचे कद के लोगों को अपनी ऊँचाई बनाए रखने के लिए बाकी लोगों को इसके बारे में बताना ज़रूरी होता है। शर्वरी के पास बताने के लिए कोई था नहीं, तो उसे अपने कद की थोड़ी चिंता हुई, पर वह कर भी क्या सकती थी!
दफ्तर पहुँचते ही उसने अपने कर्मचारी को बुलाया और पूछा, "यहाँ नारियल पानी तो मिलता ही होगा न?"
"जी मैडम, मिलता है, बिल्कुल मिलता है।"
"तो रोज़ हमारे यहाँ एक भिजवा दिया कीजिए।"
"बिल्कुल मैडम, शाम या सुबह?"
"शाम ही ठीक रहेगा।"
कर्मचारी सिर हाँ में हिलाकर जा चुका था। सफेद चक्के वाली कुर्सी पर विराजमान शर्वरी को गणमान्य और विश्वासभाजन होने की अद्वितीय अनुभूति हो रही थी। इसके बाद वह दफ्तर के कामों में लग गई।
तीन दिन बीत गए, हर शाम नारियल पानी घर पहुँचता रहा। चौथे दिन, रविवार की सुबह, शर्वरी नारियल में स्ट्रॉ डाले एक कॉमेडी वीडियो का आनंद ले रही थी, जब उसके एक दोस्त का फोन आया।
"हेलो, क्या कर रही है शर्वरी, सुबह-सुबह?"
"नारियल पानी पी रही हूँ।"
दोस्त शर्वरी को अच्छी तरह जानता था, इसलिए उसे आश्चर्य हुआ। "तू खुद बाहर गई थी लेने?"
"अरे नहीं बाबा, मैं क्यों जाऊँगी भला?"
और फिर शर्वरी ने पूरी बात एक नाटकीय अट्टहास में लपेट कर उसे कह सुनाई। दोस्त पहले हँसा, फिर बोला,
"तू ठीक तो है न? क्या बोले जा रही है?"
"ऐसा क्या कह दिया मैंने? आखिर मेरा हक है, मैं क्यों अपना हक छोड़ूँ?"
"हक तेरा सिर्फ महीने के अंत में मिलने वाला वेतन है, बाकी सब कुर्सी का खेल है, बाबू।"
शर्वरी ने हँसकर बात पलट दी, लेकिन दोस्त की बात उसके ज़ेहन में अटक गई थी। फोन रखने के बाद जब उसने कॉमेडी वीडियो वापस चलाया, तो उसे ज़रा भी हँसी नहीं आई। स्क्रीन पर चल रहे मज़ाक अब फीके लग रहे थे, और उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी घर कर गई थी।
शब्द कानों में गूँज रहे थे। क्या सच में? क्या ये कुर्सी ही थी जो उसे यह ‘सुविधा’ दिला रही थी? क्या वो भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बन गई थी, जिससे खुद को अलग मानती थी?
हाथ में नारियल पानी लिये वो खड़ी हो गई और बरामदे में टहलने लगी। थोड़ी थोड़ी देर पर एक एक घूंट पानी पीती रही। हर घून्ट के साथ उसे अपना ऊंचा कद ज़रा कम होता जान पड़ा। नारियल रख कर अब वो अपने फोन में कुछ हिसाब लगाने बैठ गई। छेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते रहे-क्रोध, लज्जा, उदासी, विसमय, निश्चय, और अंत में जो भाव ठहर गया वो था प्रसन्नता का जिसमें थोड़े अभिमान की भी मिलावट थी।
शाम हुई, घंटी बजी। दरवाज़ा खोला तो सामने कर्मचारी नारियल पानी लिए खड़ा था। शर्वरी ने तुरंत आज तक के हिसाब के पैसे आगे बढ़ा दिये। वह मना करता रहा, मगर शर्वरी पीछे नहीं हटी।
जब दरवाज़ा बंद करके वह मुडी, तो उसके चेहरे पर वही प्रसन्नता का भाव था।अब जब उसने नारियल पानी का एक घूंट लिया, तो उसे लगा कि सत्य निष्ठा से उसका चरित्र और स्वाभिमान से उसका कद फिर से ऊंचा हो गया है।
अगर कोई शर्वरी को अभी देख पाता तो उसे बताता कि उसका कद स्वाभिमान से नहीं बल्कि दंभ की ऊंची, अभिमानी चप्पलें पहनने से उंचा हो गया है। साथ ही इस बात का भी गवाह बनता कि आखिरकार शर्वरी है तो मनुष्य ही, मगर...आपको तो पता ही है

क्या शर्वरी क्या चल रहा है? ऐसे बहुत अच्छा लिखी हो
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