कहता है सनोबर

 वर्षों से यही खड़ा हूँ मैं—न जाने कितने सावन देखे हैं, न जाने कितने मेले। इस कस्बे के हर ग़म और ख़ुशी में चुपचाप साझीदार रहा हूँ मैं… मैं, सनोबर!


आज भी यहाँ खड़ा हूँ, जबकि मेरे आस-पास के सारे पेड़ सूख चुके हैं। यह इलाके में सूखे का तीसरा साल है। ज़मीन बंजर हो गई है, कई परिवार कस्बा छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन मैं अब भी यहीं हूँ—इस चिलचिलाती धूप में, इस वीरान होते कस्बे के बाहरी छोर पर।


इस जलते रेगिस्तान में नंगे पाँव कौन चला आ रहा है? शायद सैय्यद है। काफ़ी परेशान दिख रहा है। उसे देखकर लगता है, जैसे समय ठहर गया हो। अभी कल ही की बात लगती है, जब उसके अब्बा ने मेरी टहनी पर झूला बाँधकर उसे झुलाया था। और अब, कुछ ही दिनों में उसकी बिटिया का निकाह है।


वह मेरे तने से टिककर बैठ गया है। उसकी आँखों से आँसू बह रहे हैं, लेकिन वह कुछ नहीं बोलता। बस, सामने फैले अपने बंजर खेत को देखता रहता है। इस सूखे ने उसकी आय के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। जब सब कस्बा छोड़कर चले गए, तब भी सैय्यद ने अपनी पुश्तैनी ज़मीन नहीं छोड़ी। पाई-पाई जोड़कर उसने अपनी बिटिया का निकाह तय किया है। शायद यही सोच में डूबा है, या फिर सूखी ज़मीन की दरारों में अपना भविष्य देख रहा है।


निकाह का दिन।


ऐसा लगता है मानो मेरी ही बिटिया ब्याही जा रही हो। शहनाइयों की आवाज़ मेरे तनों तक गूँज रही है। आज सैय्यद के चेहरे पर थोड़ी राहत है। बीते वर्षों में उसने कितनी परेशानियाँ झेली थीं—पत्नी के गुज़र जाने के बाद उसकी बिटिया ही उसका सहारा थी। तीन साल से खेतों में फसल नहीं हुई, सरकार से भी कोई मदद नहीं मिली, लेकिन उसने किसी तरह निकाह के लिए पैसे जुटा ही लिए।


रात के आखिरी पहर में मुझे फिर कोई अपनी ओर आता दिखा। धीमे कदमों से खुद को घसीटता हुआ सैय्यद था। वह मेरे पास आकर बैठ गया। उसकी आँखें शून्य में खोई हुई थीं—न रो रही थीं, न बोल रही थीं। आज उसकी बिटिया विदा हो गई थी, लेकिन शायद उसके भीतर का कुछ और भी हमेशा के लिए विदा हो चुका था।


सुबह कस्बे के लोग मेरे आसपास इकट्ठा थे। सब मेरी टहनी की ओर देख रहे थे—वहीं, जहाँ कभी सैय्यद का झूला बँधा था। आज उसी टहनी से उसका निर्जीव शरीर झूल रहा था।


उसने अपनी पुश्तैनी ज़मीन बेच दी थी।


अब मैं भी सूख जाना चाहता हूँ… एक और सैय्यद देखने की हिम्मत मुझमें नहीं।




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