लिखे जो ख़त तुझे
कल अपने फोन की गैलरी स्क्रोल करते हुए मुझे एक चिट्ठी की फोटो मिली। मुझे याद आया कि यह चिट्ठी पापा को घर की पुरानी आलमारी से मिली थी। उन्होंने व्हाट्सएप पर उसकी फोटो शेयर की थी हमें दिखाने के लिए की पुराने जमाने के खत कैसे हुआ करते थे। फोटो को ज़ूम करके मैंने पढ़ा कि उसमें कई सवाल थे। "क्या आपको हमारा पिछला खत मिला?", "अब तबीयत कैसी है आपकी ?", "आप लोग अगले महीने शादी में तो आ रहे हैं ना ?"
पता नहीं इन सवालों के जवाब किसी ने उन्हें लिखे या नहीं।
मैं जब 6 साल की थी तब मैंने अपना पहला खत लिखा था, अपनी दादी को। उन्हें मैंने कभी देखा नहीं था फिर भी कुछ कहना था उनसे। ख़त पहुंचाने का कोई जरिया नहीं जानती थी, तो घर की एक दरवाजे पर चिपका आई थी। पागल थी मैं!
चिट्ठियाँ लिखने का सिलसिला यहां तक सीमित नहीं रहा। वैसे तो मेरे बड़े होने के साथ दुनिया छोटी होती गई और कोई किसी से इतना दूर नहीं रह गया कि उसे खत लिखा जाए। पर कुछ लोगों के लिए अपनों के भी इतने पास जाना बहुत मुश्किल होता है।
मैंने बहुत से खत लिखे दोस्तों को, अपनों को, जिंदगी को। कुछ भेजे, कुछ अपने पास ही रहने दिए। कुछ में प्यार लिखा, कुछ में नाराज़ी, कुछ को खाली छोड़ दिया, बस अपना नाम लिखकर।
'शायद तुमसे बातें कम की मैंने
पर तुम्हें लिखा बहुत है'
चिट्ठियाँ आजादी देती हैं सवाल पूछने की और वक्त देती हैं जवाब के लिए खुद को तैयार करने को।
कभी-कभी सोचती हूं कि क्या फायदा इन सब का। जो चिट्ठी मैंने दरवाजे पर चिपकाई थी, कुछ सालों बाद उस पर नया पेंट चढ़ गया। बहुत से खत मैंने खुद जला दिए। ज्यादातर कभी भेजे ही नहीं, जो भेजे उनके जवाब नहीं आए। हाँ, कुछ ख़तों के जवाब जिंदगी ने मुझे लिखना शुरू किए हैं और उतना काफी है। वैसे भी चिट्ठियाँ हमेशा लिखने वाले के हक की होती हैं।
हर तरह की प्रेम की पराकाष्ठा का सबसे छोटा किंतु सबसे सरल भाव होती है चिट्ठियाँ। अगर किसी ने आपको लिखी हैं तो खुद को खुशकिस्मत मानिए,खास नहीं।
क्योंकि चिट्ठियाँ हमेशा लिखने वालों के हक की होती हैं ।

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