पेंसिल
दो दिन पहले मैंने एक वीडियो देखी। उसमें ऐसा कुछ नहीं था जो मुझे आज तक याद रहे। हाँ, जो याद आ रही है वह है एक पेंसिल और उस पेंसिल से रेखांकित किताब के पन्ने। मेरे पास कई सारी कलमें हैं- जेल, बॉल, इंक , एक हाइलाइटर भी है। नहीं है तो एक पेंसिल।
मेरी याद से आखिरी बार मैंने पेंसिल इंजीनियरिंग का कोई ग्राफ बनाने के लिए उठाई थी। पर मैंने अपने ग्राफ खुद कब ही बनाए हैं ।मगर आप मेरा आशय समझ गए होंगे।
अगर मेरे पास आज एक पेंसिल होती भी तो मैं क्या करती ? ना मुझे चित्रकला में कोई रुचि है , ना सरकारी दस्तावेजों पर पेंसिल से दस्तखत किए जाते हैं, और ना ही यह लेख में कागज पर लिख रही हूँ। शायद इसलिए अब तक नहीं ली। शायद इसलिए अब अच्छी हैंडराइटिंग के लिए एक्स्ट्रा मार्क्स नहीं मिलते।
बचपन में मेरे पास कई तरह की पेंसिलें थी । किसी ने मुझे शाकालाका बूम बूम वाली पेंसिल भी ला कर दी थी। मैंने कोशिश की थी, काम नहीं करती ।
अगर दिल को तसल्ली देने के लिए मैं एक पेंसिल ले भी आऊँ तो उसका क्या करूंगी?
ज्यादा कुछ तो नहीं , बस किताबें पढ़ते हुए जो लाइन पसंद आएगी उसे रेखांकित करूंगी , और दूसरी बार पढ़ते हुए कोई और लाइन पसंद आई तो पहली को मिटाकर दूसरी को उसका स्थान दूंगी।
ज़्यादा कुछ तो नहीं , बस किसी कविता की सुंदर, गूढ़ पंक्तियों का आशय पन्ने के कोने में लिख लूँगी। और जैसे समय के साथ उसके मायने बदलते जाएँगे मैं भी अपना आशय बदल कर लिखती रहूँगी।
ज्यादा कुछ तो नहीं, बस लिखूँगी कई सारी चिट्ठियॉं, हर रोज। और उन्हें किसी को नहीं भेजूंगी । शायद कुछ तुम्हें भेज दूँ। और जब वक्त की फरमाइश होगी तो उन्हें मिटा दूँगी। उन्हें जलाना नहीं पड़ेगा- ना तुम्हें ना मुझे।
ज्यादा कुछ तो नहीं, बस जीवन के कैनवास पर मौसमों के हिसाब से रंग भरूँगी। रंग- जिन्हें हल्का या गहरा करने के लिए मुझे मौसम बदलने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
ज्यादा कुछ तो नहीं , बस माँ के हाथ में पेंसिल और खाली कॉपी देकर उन्हें फिर से कोई नया अक्षर सिखाने कहूँगी।
ज्यादा कुछ तो नहीं , बस सुंदर लिखावट में रोज कुछ लिखने की कोशिश करूँगी और लिखावट बिगड़ जाने पर उसे मिटाकर सुधार लूँगी।
या शायद ढूंढूंगी वो रबर जो मेरी पेंसिल की गलतियों को पूरी तरह मिटा तो न पाए पर खुशबू बहुत मीठी छोड़ जाए।
यूँ तो मेरे पास कई सारी कलमें हैं - जेल, बॉल, इंक ,एक हाइलाइटर भी है । नहीं है तो बस एक पेंसिल।

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