उद्भावना - 9

 19 तारीख को गुजरे हुए आज पूरे 10 दिन हो गए हैं। अगर आप सांसारिक मोहपाश से परे एक निर्मोही का जीवन व्यतीत करते हैं, तो मैं आपको बता दूं कि 19 नवंबर को क्रिकेट विश्व कप का फाइनल मुकाबला था जिसमें भारत को हराकर ऑस्ट्रेलिया विश्व विजेता बना। काश मैं भी आपकी तरह इस मोहपाश से मुक्त होती!

"खेल में हार जीत तो लगी ही रहती है"

 इस सुविचार को सालों से सुनते आने के बावजूद हम ना तो इस कर्म में स्थापित कर पा रहे हैं ना विचार में।

आपके विषय में मुझे ज्ञात नहीं , पर मैंने इस टीम को, खिलाड़ियों को, इस खेल को अपने निजी जीवन से कुछ इस प्रकार जोड़ लिया था जैसे दो कटी पतंगों के उलझे हुए मांझे। जब निजी जीवन में मुझे कोई विजय पताका लहराती ना दिखी, तो मैंने उसे स्टेडियम में लहराते हजारों राष्ट्रीय ध्वजों में पाया। शायद इसलिए यह हार मुझे अपनी हार लगती है।

हाँ, तो मेरी पिछली हार को 10 दिन हो चुके हैं और आने वाले 10 दिन मुझे अपनी अगली हार की तरफ ले जा सकते हैं ।

ऑनलाइन उपलब्ध मोटिवेशन कि मैं कभी प्रशंसक नहीं रही हूँ, तो अब भी उस ओर रुख नहीं किया। मेरी आदत रही है कि मैं कुछ लाइंस, दोहे, शब्द जीवन में उपयोग आने वाली चीजों पर लिख लेती हूँ। ताकि कभी उन पर मेरी नजर पड़ जाए ।

आज सुबह जब उठते ही एक सामान्य व्यक्ति की तरह मैंने सबसे पहले अपना मोबाइल फोन खोला तो मेरा ध्यान उसकी लॉक स्क्रीन पर गया । वहाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कविता 'राम की शक्ति पूजा' की दो लाइन लिखी थीं।

जिन्हें इस कविता के बारे में नहीं पता वे कभी फुर्सत में इसे जरूर पढ़ें। वैसे तो इस कविता में भक्ति, प्रेम ,वीरत्व जैसे कई भाव हैं, लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण है उसे समझने के लिए कविता का प्रसंग संक्षिप्त में बता देती हूँ।

श्री राम और रावण के युद्ध में एक दिन ऐसा आया कि रावण काल बनकर रणभूमि में राम की सेना पर टूटा। उस दिन सूर्यास्त के पश्चात श्री राम के खेमे में निराशा और उदासी व्याप्त थी राम को जानकी से मिलने का स्वर्णिम स्वप्न आँखों से दूर होता जान पड़ता था। ऐसे में विभीषण ने बताया कि असल में महाशक्ति रावण के साथ युद्ध में उपस्थित हैं‌। उसने देवी की उपासना कर उन्हें प्रसन्न किया है, इसीलिए उसके शौर्य और पराक्रम की कोई सीमा नहीं है। तब जामवंत श्री राम को आराधना का प्रतिकार आराधना से करने का सुझाव देते हैं। श्री राम 108 इंदिवर यानी नीले कमल के फूलों से महाशक्ति की आराधना करने में लीन हो जाते हैं।

 राम की शक्ति पूजा 8 दिनों तक चलती है । अंतिम दिन जब श्री राम ध्यान के शिखर पर बैठे अंतिम कमल देवी को अर्पण करने के लिए हाथ बढ़ाते हैं , तो पात्र को खाली पाते हैं। देवी ने राम की परीक्षा लेने के लिए 108 वें कमल को हटा दिया था। राम विचलित हो जाते हैं कि अब उनकी साधना अधूरी रह जाएगी। पर अगले ही पल उन्हें ऐसा विचार आता है जिसकी वजह से हम उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम कहते हैं।

 राम को याद आता है की माता कौशल्या उन्हें राजीव नयन कहा करती थीं। उनके कमल के समान दो नयन अभी शेष हैं । क्षण भर में अपने तूणीर से एक बाण लेकर वे अपनी दाईं आंख निकाल कर देवी को अर्पण करने को तत्पर हो जाते हैं। जैसे ही राम का ब्रह्मशर उनके कमल नयन के निकट पहुंँचता है, देवी प्रकट होकर उनके कर थाम लेती हैं

''होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन!

कह महाशक्ति राम के वदन में हुईं लीन।"

यही दो लाइनें मेरी लॉक स्क्रीन पर लिखी हैं।

पता नहीं मैं अपना आशय स्पष्ट कर पाई या नहीं। पता नहीं आपकी राम में आस्था है या नहीं।

विजय प्राप्ति के लिए निराशा में भी साधना करनी पड़ती है।

 आप अपने नयन अर्पण करने के लिए शर उठाइए, देवी आप का हाथ जरूर थाम लेंगी।

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