उद्भावना- 8
20 दिनों बाद आज मैं कुछ लिख रही हूँ। विगत समय में विचारों, समय और स्याही के बीच का सामंजस्य स्थापित नहीं हो पा रहा था। स्थापित तो आज भी नहीं है, पर कुछ कार्य जीवन के आत्मिक निर्वाह के लिए अपरक्राम्य (non negotiable) होने ही चाहिए।
मैं अपने ऑफिस के कक्ष में शाम के 5 बजे अगली मीटिंग के शुरू होने का और इस लंबे दिन के खत्म होने का इंतजार कर रही हूँ।
हर लेखक जब कुछ लिखता है तो खुद को तैयार करता है, अपना एक हिस्सा दुनिया से साझा करने के लिए। साहसी और भयावाह!
कोई इससे बच नहीं सकता। कभी-कभी मुझे लगता है, शायद इसीलिए बड़े-बड़े कवि अपनी कविताएं ऐसी क्लिष्ट भाषा में लिखते थे कि उनके रहस्य और छुपा आशय कोई जान ही ना पाए।
मुझे इस लेख को थोड़ा विराम देना पड़ा। एक दोस्त ने मुझे कॉल के माध्यम से याद किया था। अच्छे दोस्त बहुत कुछ भुला देते हैं।
हाँ! अच्छे कवि, वे शब्दों का ऐसा जाल रचते हैं कि पाठक उनमें उलझ कर अंत में सिर्फ प्रशंसा ही कर पाए। और उनके रहस्य सुरक्षित रह जाएं। व्यक्त होकर भी अव्यक्त!
कल का लंबा दिन अंततः खत्म हो ही गया। आज की सुबह मैंने अपने पसंदीदा गाने सुनते और साथ ही कभी-कभी गुनगुनाते बिताई। अच्छे गाने बहुत कुछ भुला देते हैं।
हर लेखक जब कुछ लिखता है तो खुद को तैयार करता है अपना एक हिस्सा दुनिया से साझा करने के लिए। साहसी और भयावाह!
कोई इससे बच नहीं सकता।

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