उद्भावना - 6
पूरे 5 दिन बाद आज जाकर मैंने कागज-कलम उठाई है । न जाने क्या हुआ नियमित लिखने के उसे प्रण का जो मैंने लिया था। नहीं, मेरा आलस्य इसके लिए जिम्मेदार नहीं है ।
मनुष्य जब एक कदम सुदृढ़ बढ़ाता है तो यही चाहता है कि आने वाले सारे कदम सुदृढ़ और पहले से अधिक मजबूत हो । इसी आकांक्षा में वह तब तक आगे नहीं बढ़ता जब तक वह बेहतरी के लिए आश्वस्त ना हो जाए । फिलहाल ऐसा कोई आश्वासन मुझे प्राप्त नहीं है। परिपूर्ण लेखन का स्वप्न हम किसी और दिन देखेंगे।
मौसम का सौंदर्य आजकल देखते ही बनता है । शरद ऋतु द्वार पर खड़ी हो अंदर झांक रही है और मात्र उसकी दृष्टि से वायुमंडल का ताप कम होता जा रहा है । अपने ए.सी. को भी मैंने अब आराम दे दिया है । पंखे के नीचे चादर ओढ़ कर सोने के लिए यह उपयुक्त समय है ।
दो ऋतुओं का संगम सदैव मनोहर रहा है । बल्कि प्रकृति और संस्कृति दोनों ही इस बात की साक्षी हैं कि संगम सदैव सौंदर्य और जीवन से परिपूर्ण ही रहता है।
दो पारिस्थितिकी तंत्रों (ecosystems) के समागम पर जीवन ऐसा प्रस्फुटित होता है जैसा और कहीं नहीं । जैसे स्थल और समुद्र के समागम पर मैंग्रूव के जंगल।
जैसे ऋतुओं में वसंत , भाषाओं में हिंदी, सभ्यताओं में भारत - सौंदर्य और जीवन से परिपूर्ण ।
जैसे सूर्योदय के पहले की छटा, सूर्यास्त के बाद की लालिमा
भोर, सांझ, क्षितिज
पल भर के लिए आकाश में इंद्रधनुष का आना,
पल भर के लिए नजरों का मिल जाना,
अश्रु और हास्य के बीच की स्मिता ,
विग्रह और मिलन के बीच की प्रतीक्षा,
प्रारंभ और अंत के बीच का सफर,
प्रथम और सर्वोत्तम के बीच के अक्षर
सौंदर्य और जीवन - यहीं तक लिखा है आज।
परिपूर्ण लेखन का स्वप्न हम किसी और दिन देखेंगे।

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