उद्भावना - 5

 शाम को बरामदे में टहलते हुए आज मैंने एक पेड़ की टहनी पर एक घोंसला देखा । जरा गौर से देखा तो पाया की चिड़िया अब तक नहीं लौटी थी। उसके छोटे-छोटे बच्चे अपनी चोंच खोले उसकी राह देख रहे थे । दाने पानी के जुगाड़ के लिए सभी को घोंसले से उड़ना ही पड़ता है , चाहे चिड़िया हो या मनुष्य। अगर देखा जाए तो जीवन क्षणभंगुर विश्राम और असीमित यात्रा का एक चक्र ही तो है।  जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हम शारीरिक और मानसिक यात्रा ही तो करते रहते हैं- एक स्थान से दूसरे, दूसरे से तीसरे। अपने चार कमरों के सरकारी आवास के बरामदे में अकेली खड़ी होकर मुझे आभास हो रहा है कि जीवन का एकमात्र स्थापित सत्य है - विस्थापन।

यहां मुझे 'प्रवास' (migration) की जगह 'विस्थापन' (displacement) शब्द ज्यादा उपयुक्त लगता है क्योंकि चाहे भौतिक रुप से मनुष्य पुनर्स्थापित हो जाए पर मानसिक रूप से वह विस्थापित ही रहता है । उसे विस्थापित होना पड़ता है - अपने लोगों से, अपनी दुनिया से ,अपने घर से । वैसे ही जैसे कपड़े का एक टुकड़ा किसी नुकीली जगह फंसकर फटता है, चिर्रता है।

खैर , कपड़े का महत्व थान में रहने से कहां होता है। उसे किसी की कमीज, किसी का कुर्ता ,किसी का रुमाल बना ही पड़ता है । यही उसकी नियति है और हमारी भी।

चिड़िया अब अपने घोंसले में लौट चुकी है और अपने बच्चों को खाना खिला रही है । क्षण भर के लिए ईर्ष्या हुई मुझे उनसे । मगर फिर ध्यान आया कि यह बच्चे भी कल बड़े हो जाएंगे । इन्हें भी किसी दूसरे क्षेत्र के दूसरे पेड़ की दूसरी टहनी पर नया घोंसला बनाना होगा।

आखिर जीवन क्षणभंगुर विश्राम और असीमित यात्रा का एक चक्र ही तो है जिसका एकमात्र स्थापित सत्य है- विस्थापन।

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