बरख़ा
रात की कोख कोई चाँद कहाँ से लाए
ये ज़मीं बाँझ है बरसे कि न बरसे बादल "
तरुण ने जब बरख़ा की तरफ मुड़ते हुए ये ग़ज़ल कही तो बरख़ा खुद को मुस्कुरानेसे रोक नहीं पाई।
कैफ़े में बैठे उन्हें तकरीबन 1 घंटा होने को था। बातें, या यूँ कहें की एकतरफा बातें ,
तो उनकी पहले पंद्रह मिनट में ही ख़त्म हो गयी थीं, जिसमे बरख़ा ने तरुण के हर
सवाल का जवाब सिर्फ हाँ और ना में दिया था। मगर, तरुण की खुशकिस्मती और
बरख़ा की बदकिस्मती, से बारिश शुरू हो गयी। उनकी लम्बी ख़ामोशी को तरुण ने
इस ग़ज़ल से तोड़ा था।
" आपने लिखी है ? ", बरख़ा ने वापस अपनी मुस्कराहट को समेटते हुए पूछा
" आपको अच्छी लगी ? "
" आपको भी ग़ज़लें पसंद हैं ? "
तरुण थोड़ा रुका , जवाब नहीं दिया , पर मुस्कुरा कर बाहर देखने लगा।
बरख़ा वैसे तो वहाँ से जल्द से जल्द जाना चाहती थी मगर अब
उसे वहाँ से निकलने की उतनी जल्दी नहीं थी। उसने फिर से अपना सवाल दोहराया ,
" आपने लिखी है ? "
" जी नहीं , मैंने गूगल की है अभी-अभी। आपके बैग में मैंने एक ग़ज़ल की किताब
देखी तो मुझे लगा... "
इतना कह कर तरुण ज़रा झेंप सा गया , जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो।
उसकी मुस्कराहट अब हवा हो चुकी थी। उसे महसूस हुआ की बरखा कुछ कहने
वाली है और उसका दिल आने वाली बौछार के बारे में सोच के ज़रा सहम सा गया।
ये बरखा और तरुण की पहली मुलाकात थी जो उनके घर वालों ने तय की थी।
बरखा पहली बार किसी से इस तरह मिल रही थी। तरुण किसी से मिलना नहीं चाहता
था, ये तो उसकी माँ की ज़िद थी जो वो यहाँ चला आया। आया तो वो किसी और की
मर्ज़ी से था पर अब वहाँ रुकना अब अपनी मर्ज़ी से चाहता था। बारिश की बूंदों की
आवाज़ के बीच उसे बरखा की सुरीली ख़ामोशी अच्छी लग रही थी।
मगर ये बस पल भर की खुशियां थीं क्योंकि शायद बरखा उस पर नाराज़ होने वाली थी।
तरुण के अंतर्द्वंद की रेल गाड़ी पर अचानक ही बरखा की आवाज़ ने ब्रेक लगा
दिया।
" मुझे बहुत अच्छी लगी "
उस शाम पहली बार दोनों एक दूसरे की तरफ देख कर मुस्कुराये।
बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। दोनों ने अपनी अपनी कैब बुक कर लीं थी।
इसी बीच तरुण को ऑफिस से फोन आ गया और वो टेबल से उठ कर बात करने
चला गया। बात करते हुए उसने न जाने अपने बॉस को कितना कोसा होगा।
10 मिनट बाद जब वो वापस लौटा तो बरखा जा चुकी थी। तरुण का चेहरा ज़रा
मुरझा सा गया। वो मोबाइल पर अपनी कैब की लोकेशन चेक कर ही रहा था की
अपनी सामने वाली कुर्सी पर उसे कुछ दिखा।
उठ कर उसे देखते ही तरुण के चेहरे पर मुस्कान वापस खिल उठी।
किताब को उठा कर उसने पढ़ा -
' फैज़ अहमद फैज़ की बेहतरीन ग़ज़लें '

Comments
Post a Comment